सरस संगम बगहा
(फीचर) व्याघ्र परियोजना के अस्तित्व को खतरा
वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना का अस्तित्व खतरे में पड़ता नजर आने लगा है। कुछ ही दिन के अंतराल पर दो हिरणों की मौत की घटना से इस बात के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि पशु तस्कर इस इलाके में सक्रिय हो गये हैं। इसके साथ ही इन घटनाओं ने वन विभाग के इंतजामों की भी पोल खोल दी है। हालांकि दावा यही किया जा रहा है कि इन दोनों घटनाओं में से एक में ग्रामीणों ने परियोजना क्षेत्र से भटककर रेहड़ा गांव पहुंचे एक हिरण को मार डाला था, जबकि दूसरी घटना में पूर्वी चंपारण के पिड़ारी गांव में हाईस्कूल के पास एक हिरण का शव पाया गया था। वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि भटककर वहां पहुंचा वह हिरण भागने की कोशिश में किसी चीज से टकरा जाने की वजह से मारा गया था।
वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना में जानवरों के रखरखाव के लिए सरकार हर साल काफी बड़ी राशि खर्च करती है। देश की प्रमुख वानिकी परियोजनाओं में से एक वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना 880 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है, जिसमें 335 वर्ग किलोमीटर राष्ट्रीय उद्यान का सुरक्षित क्षेत्र है। परियोजना संवर्द्धन के लिए यहां चीतल, बार्किंग डियर, सांभर, सांगरी और नीलगाय आदि वन्य पशु छोड़े गए थे, लेकिन उचित देखरेख न होने की वजह से ये वन्य पशु जंगल से निकलकर ग्रामीण क्षेत्रों की ओर आ रहे हैं और मौत का शिकार हो रहे हैं। जिसकी वजह से यहां विशेष रूप से हिरणों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। वन्य प्राणी संस्थान देहरादून के अनुसार 2002 में इस परियोजना में हिरणों की संख्या लगभग छह हजार थी, जो 2003 में घटकर लगभग चार हजार ही रह गई। 2007 की गणना के मुताबिक यहां सिर्फ 1500 हिरण ही बचे रह गये थे।
वन्य पशुओं की संख्या में इतनी तेजी से कमी आने की एक वजह पशु तस्करों की सक्रियता भी है। 22 अक्टूबर 2005 को वन क्षेत्र के कक्ष संख्या 29 में चार नर चीतलों के मारे जाने की सूचना मिली थी। इसी तरह कुछ अंतराल पर प्रायः वन्य पशुओं के मारे जाने की खबरें आती रही हैं। हिरणों के मारे जाने की एक वजह हर साल गंडक नदी में आने वाली बाढ़ भी है। बरसात के दिनों में गंडक नदी का पानी परियोजना में घुस जाता है। जिसके कारण हिरणों की जान मुसीबत में पड़ जाती है। कई हिरण पानी के बहाव में दूर-दूर तक बह जाते हैं। ऐसे में वे या तो डूब कर मर जाते हैं या फिर दियारा क्षेत्रों में ग्रामीण व पशु तस्कर उनका शिकार कर लेते हैं। एक बड़ी परेशानी वन क्षेत्र में इन वन्य पशुओं के लिए भोजना की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने की भी है। ऐसे में भोजन की तलाश में भी हिरण व अन्य पशु ग्रामीण अंचलों में आ जाते हैं और फिर उनमें से कई ग्रामीणों और पशु तस्करों के हाथ पड़ जाते हैं।एक कड़वी सच्चाई तो ये है कि वनविभाग द्वारा इस परियोजना के हिरणों की सुरक्षा के लिए पिछले दो दशकों के बीच कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
सन 2007 के बाद से ही लगातार इस इलाके में हिरणों की हत्या की खबरें आती रही हैं। हिरणों की हत्या के बाद ग्रामीण उनके मांस का तो सेवन कर लेते हैं जबकि उसकी खाल ऊंचे दाम पर बिक जाती है। स्थानीय लोगों के मुताबिक हिरण की एक खाल के बदले में खालों का अवैध कारोबार करने वाले लोग ग्रामीणों को पचास हजार रुपये तक का भुगतान करते हैं। बाद में तस्कर इन खालों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी ऊंची कीमत में बेच देते हैं।
सरस संगम
(फीचर) व्याघ्र परियोजना के अस्तित्व को खतरा
वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना का अस्तित्व खतरे में पड़ता नजर आने लगा है। कुछ ही दिन के अंतराल पर दो हिरणों की मौत की घटना से इस बात के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि पशु तस्कर इस इलाके में सक्रिय हो गये हैं। इसके साथ ही इन घटनाओं ने वन विभाग के इंतजामों की भी पोल खोल दी है। हालांकि दावा यही किया जा रहा है कि इन दोनों घटनाओं में से एक में ग्रामीणों ने परियोजना क्षेत्र से भटककर रेहड़ा गांव पहुंचे एक हिरण को मार डाला था, जबकि दूसरी घटना में पूर्वी चंपारण के पिड़ारी गांव में हाईस्कूल के पास एक हिरण का शव पाया गया था। वन विभाग के अधिकारियों का मानना है कि भटककर वहां पहुंचा वह हिरण भागने की कोशिश में किसी चीज से टकरा जाने की वजह से मारा गया था।
वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना में जानवरों के रखरखाव के लिए सरकार हर साल काफी बड़ी राशि खर्च करती है। देश की प्रमुख वानिकी परियोजनाओं में से एक वाल्मीकि व्याघ्र परियोजना 880 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली हुई है, जिसमें 335 वर्ग किलोमीटर राष्ट्रीय उद्यान का सुरक्षित क्षेत्र है। परियोजना संवर्द्धन के लिए यहां चीतल, बार्किंग डियर, सांभर, सांगरी और नीलगाय आदि वन्य पशु छोड़े गए थे, लेकिन उचित देखरेख न होने की वजह से ये वन्य पशु जंगल से निकलकर ग्रामीण क्षेत्रों की ओर आ रहे हैं और मौत का शिकार हो रहे हैं। जिसकी वजह से यहां विशेष रूप से हिरणों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। वन्य प्राणी संस्थान देहरादून के अनुसार 2002 में इस परियोजना में हिरणों की संख्या लगभग छह हजार थी, जो 2003 में घटकर लगभग चार हजार ही रह गई। 2007 की गणना के मुताबिक यहां सिर्फ 1500 हिरण ही बचे रह गये थे।
वन्य पशुओं की संख्या में इतनी तेजी से कमी आने की एक वजह पशु तस्करों की सक्रियता भी है। 22 अक्टूबर 2005 को वन क्षेत्र के कक्ष संख्या 29 में चार नर चीतलों के मारे जाने की सूचना मिली थी। इसी तरह कुछ अंतराल पर प्रायः वन्य पशुओं के मारे जाने की खबरें आती रही हैं। हिरणों के मारे जाने की एक वजह हर साल गंडक नदी में आने वाली बाढ़ भी है। बरसात के दिनों में गंडक नदी का पानी परियोजना में घुस जाता है। जिसके कारण हिरणों की जान मुसीबत में पड़ जाती है। कई हिरण पानी के बहाव में दूर-दूर तक बह जाते हैं। ऐसे में वे या तो डूब कर मर जाते हैं या फिर दियारा क्षेत्रों में ग्रामीण व पशु तस्कर उनका शिकार कर लेते हैं। एक बड़ी परेशानी वन क्षेत्र में इन वन्य पशुओं के लिए भोजना की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने की भी है। ऐसे में भोजन की तलाश में भी हिरण व अन्य पशु ग्रामीण अंचलों में आ जाते हैं और फिर उनमें से कई ग्रामीणों और पशु तस्करों के हाथ पड़ जाते हैं।एक कड़वी सच्चाई तो ये है कि वनविभाग द्वारा इस परियोजना के हिरणों की सुरक्षा के लिए पिछले दो दशकों के बीच कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
सन 2007 के बाद से ही लगातार इस इलाके में हिरणों की हत्या की खबरें आती रही हैं। हिरणों की हत्या के बाद ग्रामीण उनके मांस का तो सेवन कर लेते हैं जबकि उसकी खाल ऊंचे दाम पर बिक जाती है। स्थानीय लोगों के मुताबिक हिरण की एक खाल के बदले में खालों का अवैध कारोबार करने वाले लोग ग्रामीणों को पचास हजार रुपये तक का भुगतान करते हैं। बाद में तस्कर इन खालों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी ऊंची कीमत में बेच देते हैं।
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