सरस संगम
सत्येन्द्र कुमार
बगहा पश्चिमी चम्पारण
की रिपोर्ट 22/4/18
गांव से शहर तक की धरती पर संकट ही संकट है। जमीन की हरियाली के दिन प्रतिदिन कम होने से उर्वरा शक्ति घटती जा रही है। भू-गर्भ जल स्तर के तेजी से घटते जाने से जल संकट गहराता जा रहा है। पृथ्वी के संरक्षण के प्रति बढ़ती उदासीनता के कारण मानव जीवन पर संकट गहराता जा रहा है।
डेढ़ साल पूर्व शहर में प्लास्टिक की पाबंदी पर अमल नहीं: शहर में प्लास्टिक जनित कचरेे के निष्पादन का बुरा हाल है। डेढ़ साल पूर्व नप बोर्ड ने शहर में अमानक प्लास्टिक (पॉलिथीन)के उपयोग पर पाबंदी लगा दी थी जिसके कारण धरती के जलधारण क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है। नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी डॉ. विपिन कुमार बताते हैं कि प्लास्टिक के थैलों पर प्रतिबंध को अब तक प्रभावी नहीं बनाया जा सका है लेकिन इस दिशा में हम प्लास्टिक रि-साइक्लिंग प्लांट लगाने की योजना पर कार्य कर रहे हैं। झिलिया में इसको स्थापित करने की योजना है। सॉलिडवेस्ट मैनेजमेन्ट योजना के तहत शहरी परिवारों में सूखा व गीला कचरा के दो दो डस्टवीन बांटे गए हैं। लोगों के उसका उपयोग नहीं करने से भी समस्या जटिल बनी हुई है। नगर प्रशासन इस दिशा में जागरूकता बढ़ाने की भी योजना शीघ्र ही शुरू करने वाला है।
कचरा फेंका प्लास्टिक खा कर बीमार हो मर रहे पशु: कचरों के साथ प्लास्टिक को खा रहे मवेशियों की प्रजनन व दूध देने की क्षमता दिनों दिन कम हो रही है। जिला पशुपालन पदाधिकारी डॉ. प्रमोद कुमार बताते हैं कि पॉलिथीन में लपेट कर कांच के टुकड़े और लोहे की कील तक शहर के लोग बहुतायत फेंक देते हैं। इन कांच के टुकड़ों और लोह की कील आदि खा बैठे पशु एक्यूट पैरीटाइटिस जैसे लाइलाज व जानलेवा रोग से ग्रसित हो जाते हैं। इस रोग से ग्रसित पशु का चार से पांच दिन में ही मरना तय हो जाता है।

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